गोस्वामी
तुलसीदास- आक्षेप और सच्चाई
हिंदी
साहित्य के मूर्धन्य कवि गोस्वामी तुलसीदास पर बहुधा यह आक्षेप लगाया जाता है कि
वे स्त्री जाति और समाज के निचले तबके के घोर विरोधी और निन्दक थे। एक
प्रकाशन समूह तो उनके पीछे हाथ धोकर ही पड़ गया लगता है। वह उन्हें 'पथ
प्रदर्शक' नहीं
बल्कि 'पथ
भ्रष्टक' करार
देता है। उक्त प्रकाशन समूह के मत में तुलसी दास ने समाज का पथ प्रदर्शन नहीं किया
बल्कि उसे गुमराह किया, पथभ्रष्ट किया, सही
मार्ग न दिखाकर गलत मार्ग दिखाया। स्त्री जाति और निम्न वर्ग का अनादर किया है
तुलसीदास ने। उनके विचार में समाज में व्याप्त छुआ-छूत, जाति
प्रथा इत्यादि जैसी कुरीतियों का असली सूत्रधार यह तुलसी ही है। दुर्भाग्यवश तमाम
अन्य लोग भी बिना हकीकत जाने, बिना सन्दर्भ-प्रसंग
समझे ऐसी गलत धारणा के समर्थक हो जाते हैं और आंख बन्द कर तुलसीदास को कोसने लग
जाते हैं।
वास्तव में,
गोस्वामी तुलसीदास एक मूर्धन्य साहित्यकार, हिन्दी के प्रकांड
विद्वान और एक निपुण अनुवादक थे। वे देश-काल के अच्छे ज्ञाता और
जन-मानस के पारखी थे। न केवल हिन्दी, बल्कि संस्कृत
साहित्य का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया था और काशी के पंडितों को मात दी थी। रामचरित मानस की रचना से पूर्व
उन्होंने राम कथा से सम्बद्ध संस्कृत के तमाम ग्रन्थों,
शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन-मनन किया था और अथक
परिश्रम के बाद इस ग्रन्थ की रचना की थी। इसीलिये तुलसी दास ने राम चरित मानस को
सभी शास्त्रों और सभी ग्रन्थों का निचोड़ कहा है- 'छहो
शास्त्र सब ग्रन्थन को रस।' वस्तुतः बाल
काण्ड के प्रारम्भ में ही उन्होंने यह बात स्पष्ट
कर दी है- 'नाना
पुराण निगमागम सम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोपि।'
तुलसीदास प्रमुखत:
एक भक्त कवि थे,
साहित्यकार थे। और साहित्यकार समाज
के लिये सिर्फ़ दर्पण दिखाने का काम करता है, वह समाज का नियंता
नहीं होता। समाज में व्याप्त कुरीतियों का वह द्रष्टा मात्र होता है। वह जो भी
देखता-सुनता है उसे निरपेक्ष भाव से, ज्यों का त्यों
शब्दों में पिरोकर जनता के सामने रख देता है। समाज में व्याप्त कुरीतियों को इंगित
मात्र करता
है। इन
कुरीतियों का जनक नहीं होता। इनके लिये हम उसे जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। इसके
लिये तो उस समय का समाज ही जिम्मेदार होता है, या फिर उस समाज के
नुमाइन्दे। साहित्य तो एक दर्पण की तरह है। जैसा बिम्ब होगा, दर्पण
में वैसा ही प्रतिबिम्ब दिखेगा। दर्पण को कोसने या तोड़ने से कुछ भी नहीं मिलने
वाला। इसलिये तुलसी साहित्य की निन्दा या आलोचना कर देने से त्रेता युगीन या
तत्कालीन समाज नहीं बदलने वाला।
तुलसीदास पर आरोप
लगाने वाले अपनी बात को सही साबित करने के लिये बहुधा राम चरित मानस की निम्न
चौपाई का सहारा लेते हैं:
'ढोल
गवांर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के
अधिकारी।।'
उनका
तर्क है कि तुलसी इन वर्गों को ताड़ना देने के पक्षधर थे। वे ही इनको ताड़ना का
अधिकारी मानते थे, इसलिए
उन्होंने ऐसी बात लिखी। ऐसे लोग शायद यह
नहीं जानते कि यह पंक्ति गर्ग संहिता के
निम्न श्लोक का अनुवाद मात्र है,
तुलसी
दास इस कथन के प्रणेता नहीं हैं:
'दुर्जना:
शिल्पिनो दासा
दुष्टाश्च
पटहा स्त्रिया:।
ताडिता
मार्दवं यान्ति
न
ते सत्कार भाजनं।।'
इसी
तरह से - 'पूजिय विप्र सील गुन हीना। सूद्र
न गुन
गन ज्ञान प्रवीना।।'
'पतितोSपि
द्विजः पूज्यो नार्च्यः
शूद्रो महामतिः' श्लोक का अनुवाद है।
तुलसीदास
का दोष मात्र इतना है कि उन्होंने आम जन की समझ से परे इन कठिन बातों को जनमानस के सामने
सरल हिन्दी में लाकर रख दिया और लोगों का कोप- भाजन बन गये। ठीक इसी तरह नारी जाति
के विषय में भी उनपर कई अनर्गल आरोप लगाये जाते हैं। एक आरोप उनपर यह
लगाया जाता है कि वे स्त्री वर्ग के घोर निंदक थे। वे उन्हें सभी कष्टों की जड़ मानते थे- 'प्रमदा सब दुःख खानि' तथा सभी बुराइयों का
सूत्रधार समझते थे। इस बात को साबित करने के लिए बिना सन्दर्भ प्रसंग की चौपाइयों और
दोहों को राम चरित मानस के अनेक स्थलों से
उद्धृत किया जाता है। उदाहरण
के लिए नारी
जाति के विषय में रचित उनकी ये चौपाइयाँ -
'अवगुन आठ सदा उर रहहीं। नारि स्वभाव
सत्य सब कहहीं।।
साहस
अन्रित चपलता माया। भय अविवेक असौच अदाया।।'
कुछ
तथाकथित
प्रबुद्ध लोगों द्वारा स्त्री वर्ग के बारे में उनके विचार
दर्शाने के लिए अक्सर ही उद्धृत
की जाती रहती
हैं। जबकि सच्चाई यह है
कि उक्त चौपाइयाँ चाणक्य
नीति में वर्णित निम्न श्लोक का अनुवाद
मात्र हैं :
'अन्रितं
साहसं माया
मूर्खत्वमतिलोभिता
अशौचत्वंनिर्दयत्वं
च
स्त्रिणांदोषा : स्वभावजा:।।'
साफ़ पता चलता है कि इस विचारधारा के जनक तुलसीदास नहीं हैं क्योंकि
चाणक्य तुलसीदास से बहुत पहले ईसा
पूर्व
में पैदा
हुए थे और इन दोनों के बीच लगभग दो हजार साल का अंतर था। ऐसे में
तुलसी पर मिथ्या दोषारोपण करना कहाँ तक न्याय संगत है? वस्तुत: यह
तुलसीदास का अनुवाद-कौशल है कि वे दूसरे के कथन को भी कुछ इस तरह से प्रस्तुत करते हैं कि वह
उनका मौलिक कथन सा लगने लगता है और अच्छे-अच्छे व्यक्ति भी भ्रमित हो जाते हैं।
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लोग स्त्री समाज में गर्ग संहिता को भले ही न पढ़ने का प्रयास करें श्लोक का विवेचन और गोस्वामी जी पर टिप्पणी करते हैं तो दुःख होता है ।
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