rachana sansar

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Thursday, May 17, 2012

गोस्वामी तुलसीदास और  तीर्थ राज प्रयाग
तीर्थ राज प्रयाग को इस लोक में सभी पापों को धोने वाला बताया गया है. यहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती तीन नदियों का संगम(त्रिवेणी संगम) होता है और कहा जाता है कि इस संगम में स्नान करने मात्र से व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है.और यह स्नान यदि माघ माह में हो तो कहना ही क्या है.यद्यपि आज यहाँ गंगा और यमुना सिर्फ दो ही नदियाँ विद्यमान हैं तथा सरस्वती का लोप हो चुका है फिर भी संगम स्नान का महत्व कम नहीं हुआ है और लोग उसी उत्साह और श्रद्धा से आज भी यहाँ स्नान करते हैं जैसे आज से हजार साल पहले करते थे. राम चरित मानस में गोस्वामी जी ने इसकी महिमा का बखान स्वयं भगवान राम के मुखारविंद से करवाया है. वन गमन के दौरान भगवान राम जब प्रयाग पहुँचते हैं तो वे तीर्थराज प्रयाग के माहात्म्य का इस प्रकार वर्णन करते हैं:-
छेत्रु अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा॥
सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा॥

भाव यह कि प्रयाग क्षेत्र ही दुर्गम, मजबूत और सुंदर गढ़ (किला) है, जिसको स्वप्न में भी (पाप रूपी) शत्रु नहीं पा सके हैं। संपूर्ण तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ वीर सैनिक हैं, जो पाप की सेना को कुचल डालने वाले और बड़े रणधीर हैं.
तथा-
संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा॥
चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा॥
अर्थात (गंगा, यमुना और सरस्वती का) संगम ही उसका अत्यन्त सुशोभित सिंहासन है। अक्षयवट छत्र है, जो मुनियों के भी मन को मोहित कर लेता है। यमुनाजी और गंगाजी की तरंगें उसके (श्याम और श्वेत) चँवर हैं, जिनको देखकर ही दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाती है.
और फिर-
को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ॥

प्रयाग की महिमा अकथनीय और वर्णनातीत है. इसकी महिमा का वर्णन करना किसी के वश की बात नहीं है. यह पाप-पुंज का वैसे ही नाश करता है
जैसे हाथी का शेर करता है .
रामचरितमानस में एक अन्य स्थल पर गोस्वामी जी ने लिखा है -

सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ॥

तीर्थराज प्रयाग सभी कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ है. यह तथ्य वेद -विदित है और इसका प्रभाव संसार में प्रकट है. माघ माह में यहाँ स्नान-दान करने से आदमी के सारे पाप तिरोहित हो जाते हैं . यही कारण है कि हर वर्ष माघ के महीने में कड़कती हुई ठण्ड में भी लोग पूरे उल्लास के साथ संगम के किनारे की रेतीली भूमि में खुले वितान के नीचे डेरा डाल देते हैं और माघ महीने के ख़त्म होने तक ठिठुरती रातें बिताते हुए अपना इह लोक और पर लोक संवारने का प्रयास करते हैं.



मानस में प्रयाग के माहात्म्यके साथ - साथ गोस्वामी जी ने माघ स्नान के माहात्म्य का भी वर्णन किया है-

माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥


अर्थात जब माघ माह में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो देव, दनुज, किन्नर एवं मनुष्य सभी तीर्थ राज प्रयाग आकर आदर सहित पावन त्रिवेणी में अवगाहन करते हैं.

प्रयाग में हर ६ वर्ष में अर्ध कुम्भ तथा हर १२ वर्ष में पूर्ण कुम्भ का मेला भी लगता है. ऐसे १२ पूर्ण कुम्भ के बाद अर्थात १४४ वर्ष में एक बार महाकुम्भ का मेला लगता है. प्रसंगवश यह बता देना समीचीन होग कि कुम्भ मेले का निर्धारण बृहस्पति और सूर्य की स्थिति के आधार पर होता है. जब बृहस्पति और सूर्य सिंह राशि में होते है तो उस वर्ष कुम्भ का आयोजन नासिक में होता है. जब सूर्य मेष राशि में होता है तो कुम्भ का आयोजन हरिद्वार में किया जाता है. जब बृहस्पति वृष राशि में और सूर्य मकर राशि में होता है तो इस मेले का आयोजन प्रयाग में होता है. जब सूर्य और बृहस्पति वृश्चिक राशि में होते हैं तब कुम्भ मेले का आयोजन उज्जैन में होता है. कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान प्राप्त अमृत-कलश(कुम्भ) को लेकर देवताओं और दैत्यों में विवाद हुआ जो १२ दिन और १२ रात (मनुष्यों के १२ वर्ष के बराबर) तक चला. माना जाता है कि भगवान विष्णु इस कुम्भ को लेकर भाग गए और इस भागने के क्रम में कलश से अमृत की कुछ बूँदें इन चार स्थानों अर्थात प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में गिरीं, इसी कारण हर १२ वर्ष पर कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है.
दुर्भाग्यवश आज इसी त्रिवेणी में तमाम नाले और बूचडखाने की गन्दगी मिलाई जा रही है और हम जान बूझकर इसकी अनदेखी करते जा रहे हैं, यह जानते हुए भी कि इन पावन नदियों में ही हमारी पहचान बसी है.

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